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कहाँ तो तय था (दुष्यंत कुमार की रचना)
कहाँ तो तय था (दुष्यंत कुमार की रचना)

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए  कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए  यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है  चलो यह...

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मत कहो, आकाश में कुहरा घना है
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है । सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से, क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है । इस सड़क...

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बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं
बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं, और नदियों के किनारे घर बने हैं । चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर, इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं । इस तरह टूटे...

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